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2005 में भर्ती... 2016 में जांच... 2019 में कार्रवाई का आदेश... 2026 में फिर वही निर्देश! आखिर 129 शिक्षाकर्मियों की फाइल पर 21 साल से फैसला क्यों नहीं?

तीन सदस्यीय जांच समिति ने कथित अनियमितताओं की ओर किया था इशारा, जिला पंचायत ने 15 दिन में कार्रवाई के दिए थे निर्देश, सात साल बाद कलेक्टर ने फिर मांगी सूची... लेकिन अब तक अंतिम कार्रवाई का इंतजार....

AI जनरेट फोटो 
गजानंद कश्यप छत्तीसगढ़ न्यूज डेस्क गरियाबंद 

गरियाबंद_मैनपुर जनपद पंचायत में वर्ष 2005 से 2007 के बीच हुई शिक्षाकर्मी वर्ग-03 भर्ती का विवादित मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। यह ऐसा मामला है जिसकी फाइल पिछले दो दशकों से प्रशासनिक दफ्तरों के बीच घूमती रही, लेकिन आज तक अंतिम नतीजा सामने नहीं आ सका।

वर्ष 2016 में तीन सदस्यीय जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसके बाद 17 जुलाई 2019 को जिला पंचायत गरियाबंद ने जनपद पंचायत मैनपुर को पत्र जारी कर 15 दिनों के भीतर कार्रवाई कर प्रतिवेदन भेजने के निर्देश दिए। इसके बावजूद वर्षों तक मामले में कोई निर्णायक कार्रवाई सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई।

अब वर्ष 2026 में कलेक्टर ने फिर से इसी मामले की सूची दो दिनों के भीतर प्रस्तुत करने और जांच में दोषी पाए जाने वालों पर नियमानुसार कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। इससे बड़ा सवाल उठ रहा है कि यदि मामला इतना गंभीर था तो सात वर्षों तक फाइल आखिर रुकी क्यों रही?

जांच में क्या सामने आया था?

जिला पंचायत के वर्ष 2019 के पत्र में तीन सदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया था कि वर्ष 2005 से 2007 के बीच शिक्षाकर्मी वर्ग-03 की भर्ती में 129 नियुक्तियां जांच के दायरे में हैं। पत्र में कथित फर्जी दिव्यांग प्रमाण-पत्र एवं अन्य दस्तावेजों के आधार पर नियुक्तियों सहित विभिन्न अनियमितताओं का उल्लेख किया गया था।

इसी आधार पर तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जनपद पंचायत मैनपुर को निर्देश दिया गया था कि संबंधित मामलों में नियमानुसार कार्रवाई कर 15 दिनों के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करें।

15 दिन का आदेश... लेकिन सात साल तक सन्नाटा

पत्र में तय समय-सीमा महज 15 दिन थी, लेकिन यह समय-सीमा सात साल में बदल गई। इस दौरान न तो बड़े स्तर पर कार्रवाई की सार्वजनिक जानकारी सामने आई और न ही यह स्पष्ट किया गया कि जांच रिपोर्ट पर अंतिम निर्णय क्या हुआ।

अब सवाल यह है कि यदि जांच रिपोर्ट मौजूद थी और जिला पंचायत ने कार्रवाई के निर्देश भी दे दिए थे, तो मामला वर्षों तक लंबित क्यों रहा?

फिर कलेक्टर हुए सख्त

हाल ही में आयोजित समय-सीमा (टीएल) बैठक में कलेक्टर ने इस प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए वर्ष 2005 से 2007 के बीच हुई संबंधित नियुक्तियों की पूरी सूची दो दिनों के भीतर प्रस्तुत करने के निर्देश दिए।

उन्होंने साफ कहा कि जांच में यदि कोई दोषी पाया जाता है तो उसके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

लेकिन अब तक क्या बदला?

कलेक्टर के निर्देशों के बाद भी अब तक इस मामले में अंतिम कार्रवाई, नियुक्ति निरस्तीकरण या जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध किसी स्पष्ट प्रशासनिक निर्णय की आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। यही वजह है कि यह मामला फिर सवालों के घेरे में है।

21 साल में बदलते रहे अधिकारी, फाइल वहीं की वहीं?

वर्ष 2005 में शुरू हुई भर्ती प्रक्रिया से लेकर 2026 तक कई कलेक्टर, सीईओ जिला पंचायत, जनपद सीईओ और विभागीय अधिकारी बदल गए, लेकिन यह मामला अब भी निर्णायक मोड़ तक नहीं पहुंच पाया।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि_

क्या जांच रिपोर्ट पर कभी अंतिम फैसला होगा?

2019 के आदेश का पालन क्यों नहीं हुआ?

सात साल की देरी के लिए कौन जिम्मेदार है?

क्या अब दोष तय होंगे या फिर फाइल दोबारा दफ्तरों में घूमती रहेगी?


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