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जलवायु संकट की बड़ी चेतावनी: बढ़ती गर्मी, आकाशीय बिजली और सूखे का खतरा, विशेषज्ञ बोले– जंगल बचेंगे तभी बचेगा भविष्य

उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के कोयबा ईको सेंटर में आयोजित जागरूकता कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने किसानों, वनवासियों और वन्यजीवों पर मंडरा रहे जलवायु परिवर्तन के खतरों से किया आगाह।


गजानंद कश्यप छत्तीसगढ़ न्यूज डेस्क गरियाबंद 

मैनपुर_जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का नहीं, बल्कि वर्तमान का सबसे बड़ा संकट बन चुका है। बढ़ता तापमान, आकाशीय बिजली की घटनाएं, अनियमित बारिश, सूखा और जंगलों में आग जैसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। इन गंभीर चुनौतियों को देखते हुए उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व (USTR) द्वारा कोयबा ईको सेंटर में वन आश्रित समुदायों के लिए जलवायु परिवर्तन जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया।

कार्यक्रम में जलवायु विशेषज्ञ नितिन सिंघी और छत्तीसगढ़ राज्य वन्यजीव बोर्ड के सदस्य गौरव निहलानी ने बताया कि यदि समय रहते प्रकृति और जंगलों का संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में खेती, जल स्रोत, वन्यजीव और ग्रामीणों की आजीविका पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।

वेट बल्ब तापमान' बना नई चिंता

विशेषज्ञों ने बताया कि बढ़ता वेट बल्ब तापमान (Wet Bulb Temperature) सामान्य गर्मी से कहीं अधिक खतरनाक है। अधिक तापमान और नमी के कारण शरीर खुद को ठंडा नहीं रख पाता, जिससे हीट स्ट्रोक और जान का खतरा तक बढ़ जाता है। खेतों में काम करने वाले किसान, मजदूर, वनकर्मी, बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे सबसे ज्यादा जोखिम में हैं।

अनियमित बारिश और बिजली गिरने की घटनाएं बढ़ीं

कार्यक्रम में बताया गया कि हाल के वर्षों में छत्तीसगढ़ में आकाशीय बिजली, अचानक बाढ़, लंबे सूखे और अनियमित बारिश की घटनाओं में तेजी आई है। इसका सीधा असर खेती, भूजल, जंगल और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। विशेषज्ञों ने किसानों को जल संरक्षण, मिट्टी संरक्षण और जलवायु अनुकूल खेती अपनाने की सलाह दी।

वन्यजीव संरक्षण ही जलवायु संरक्षण

गौरव निहलानी ने कहा कि जंगल केवल बाघ, हाथी और तेंदुए का घर नहीं हैं, बल्कि हजारों जीव-जंतुओं और वनस्पतियों का सुरक्षित आश्रय हैं। यही जैव विविधता पर्यावरण का संतुलन बनाए रखती है। जंगल कार्बन अवशोषित करते हैं, वर्षा चक्र को संतुलित रखते हैं, भूजल का पुनर्भरण करते हैं और प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को कम करते हैं।

स्थानीय ग्रामीणों ने लिया संरक्षण का संकल्प

कार्यक्रम में कोयबा, करलाझर, देवलसुर, बासनझोला, जुगाड़, आमाड सहित आसपास के गांवों के सरपंच, ग्रामीण, वन विभाग के अधिकारी, वनकर्मी और ईको डेवलपमेंट समिति के सदस्य बड़ी संख्या में शामिल हुए। सभी ने पौधारोपण कर अधिक से अधिक पेड़ लगाने और जंगलों की रक्षा का संकल्प लिया।
सामूहिक जिम्मेदारी का संदेश

कार्यक्रम के अंत में अधिकारियों ने कहा कि जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौती से निपटने के लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। प्रत्येक नागरिक को जंगलों की सुरक्षा, जल संरक्षण, जैव विविधता संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। यही आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की सबसे मजबूत नींव है।