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120 साल पुरानी अनोखी परंपरा: देवभोग में आज भी भगवान जगन्नाथ लेते हैं 'लगान', पुरी मंदिर से है सीधा संबंध


गजानंद कश्यप छत्तीसगढ़ न्यूज डेस्क गरियाबंद
 

देवभोग_छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में स्थित देवभोग जगन्नाथ मंदिर का इतिहास और रहस्य सीधे ओडिसा के विश्व प्रसिद्ध पुरी जगन्नाथ मंदिर से जुड़ा हुआ है इस मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि यहाँ आज भी भगवान जगन्नाथ अपने भक्तों और किसानों से 'लगान' (Tax) लेते हैं ।

भगवान को लगान देने की अनोखी परंपरा 84 गांवों का संकल्प ।

करीब 120 साल से भी पहले (वर्ष 1854 में) इस क्षेत्र के 84 गांवों के प्रमुखों (गोहटिया) ने एक ऐतिहासिक संकल्प लिया था फसल का हिस्सा परंपरा के अनुसार, यहाँ के किसान अपनी फसल (मुख्य रूप से सुगंधित चावल और मूंग दाल) का एक हिस्सा भगवान जगन्नाथ को लगान के रूप में देते हैं ।

पुरी से जुड़ाव .......

हर साल रथयात्रा से कुछ दिन पहले पुरी मंदिर से एक विशेष प्रतिनिधि (पंडा) देवभोग आता है वह यहाँ इकट्ठा हुए लगान का एक-चौथाई हिस्सा अपने साथ पुरी ले जाता है पुरी के जगन्नाथ मंदिर में महाप्रभु को सबसे पहले इसी सुगंधित चावल का भोग लगाया जाता है ।

देवभोग' नाम पड़ने का रहस्य कुसुम भोग से देवभोग ।

ब्रिटिश काल में इस पूरे क्षेत्र का नाम 'कुसुम भोग' हुआ करता था नाम का कारण जब यहाँ के विशेष चावल और अनाज को सीधे पुरी में भगवान (देवता) के भोग के लिए भेजा जाने लगा, तो इस अद्भुत परंपरा के कारण लगभग 123 साल पहले इस पूरे इलाके का नाम बदलकर 'देवभोग' रख दिया गया।

मंदिर का निर्माण ----

बिना सीमेंट और छड़ का चमत्कारिक निर्माणदेसी सामग्रियों का जोड़ इस मंदिर के निर्माण में आधुनिक सीमेंट, कंक्रीट या लोहे की छड़ (Iron rods) का बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं किया गया है प्राचीन वास्तुकला मंदिर की दीवारों और पत्थरों को जोड़ने के लिए बेल, चिवड़ा, बबूल की गोंद और अन्य पारंपरिक देसी सामग्रियों के मिश्रण का उपयोग किया गया है 47 साल का समय इस अनूठी और जटिल निर्माण पद्धति के कारण इस भव्य मंदिर को पूरी तरह तैयार होने में 47 वर्ष का लंबा समय लगा था, और यह सन 1901 में बनकर पूरा हुआ ।

मंदिर निर्माताओं से जुड़ी रहस्यमयी कहानी तीन पीढ़ियों का योगदान।

मंदिर का निर्माण तत्कालीन जमींदार भगवानो बेहेरा ने अपनी जमीन दान देकर शुरू कराया था, लेकिन निर्माण के दौरान ही उनकी मृत्यु हो गई इसके बाद रामचंद्र बेहेरा ने काम संभाला, परंतु आधा निर्माण होने पर उनकी भी असमय मृत्यु हो गई। अंततः बलभद्र बेहेरा ने साल 1901 में इस मंदिर को पूरा करवाया स्थानीय लोग इसे एक दैवीय संयोग और भगवान की इच्छा मानते हैं।