देवभोग-कैंटपदर पीडब्ल्यूडी मार्ग के ग्राम गिरसुल बाजार चौक स्थित खतरनाक अंधे मोड़ की समस्या को प्रमुखता से उठाए जाने के बाद विभाग और ठेकेदार हरकत में तो आए, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि मौके पर केवल खानापूर्ति कर जिम्मेदारी पूरी कर ली गई। सड़क की वास्तविक समस्या आज भी जस की तस बनी हुई है।
स्थानीय लोगों के अनुसार खबर प्रकाशित होने के बाद ठेकेदार द्वारा कुछ स्थानों पर गड्ढों में मुरम डाली गई और सड़क किनारे शोल्डर में थोड़ी बहुत भराई कर दी गई। आरोप है कि इसके लिए भी सड़क किनारे की मिट्टी और मुरम को जेसीबी से खोदकर गड्ढों में डाल दिया गया, जबकि स्थायी और गुणवत्तापूर्ण मरम्मत की दिशा में कोई ठोस कार्य नहीं किया गया।
ग्राम पंचायत सरपंच जितेंद्र कुमार मांझी ने कहा कि सड़क निर्माण कार्य को अभी लगभग ढाई वर्ष ही हुए हैं। नियमानुसार ठेकेदार की सड़क के रखरखाव और मरम्मत की जिम्मेदारी चार वर्ष तक रहती है। इसके बावजूद देवभोग से कैंटपदर तक कई हिस्सों में सड़क उखड़ने लगी है, गड्ढे बन गए हैं और किनारे टूट रहे हैं। ऐसे में निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
सबसे बड़ी चिंता का विषय गिरसुल बाजार चौक का अंधा मोड़ बना हुआ है। यहां आज भी न तो चेतावनी बोर्ड लगाए गए हैं, न रिफ्लेक्टर और न ही किसी प्रकार के सांकेतिक सुरक्षा चिह्न। रात के समय और बारिश के दौरान यह मोड़ दुर्घटनाओं का कारण बन सकता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार इस स्थान पर हादसे हो चुके हैं, लेकिन विभाग की ओर से सुरक्षा उपायों को लेकर अब तक गंभीरता नहीं दिखाई गई।
रोहन मरकाम का आरोप है कि पीडब्ल्यूडी विभाग केवल कागजी कार्रवाई और औपचारिक निरीक्षण तक सीमित नजर आ रहा है। यदि समय रहते गुणवत्तापूर्ण मरम्मत और सुरक्षा व्यवस्था नहीं की गई तो भविष्य में किसी बड़े हादसे की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। यह मार्ग क्षेत्र के लगभग 15 गांवों की जीवनरेखा माना जाता है। प्रतिदिन सैकड़ों ग्रामीण, छात्र-छात्राएं, किसान और व्यापारी इसी सड़क से देवभोग मुख्यालय आते-जाते हैं। इसके बावजूद सड़क की बदहाल स्थिति और सुरक्षा उपायों की अनदेखी लोगों में नाराजगी बढ़ा रही है।
लोगों का सवाल
खबर छपने के बाद गड्ढों में मुरम डालकर औपचारिकता तो पूरी कर दी गई, लेकिन आखिर गिरसुल के खतरनाक अंधे मोड़ पर चेतावनी संकेतक और स्थायी सुरक्षा व्यवस्था कब होगी? अब यह देखना होगा कि पीडब्ल्यूडी अधिकारी इस समस्या को गंभीरता से लेते हैं या फिर किसी बड़ी दुर्घटना के बाद ही कुम्भकर्णी नींद से जागेंगे।




