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अब नहीं गूंजती ढेकी की आवाज....कभी घर में ढेकी देखकर ब्याही जाती थी बेटियां, अब बनी म्यूजियम की शोभा

अब नहीं गूंजती ढेकी की आवाज....कभी घर में ढेकी देखकर ब्याही जाती थी बेटियां, अब बनी म्यूजियम की शोभा

आराम तलब जिंदगी की चाह में छूटते जा रहा हैं परंपरागत प्रसाधन

फाइल फोटो 
गजानंद कश्यप गरियाबंद आज हम लोगों में से बहुत लोग ढेकी का नाम भी नहीं सुने होगे, और ना ही कभी देखे होंगे कि ढेकी आखिर चीज क्या है?  आज गेहूं पीसने , धान कूटने के लिये बड़ी बड़ी राईस मिले, आटा चक्की मशीने उपलब्ध है। पहले के जमाने में जब ये मशीने नहीं थे तब धान कूटने के लिये लकड़ी से बनी ढेकी का ही सहारा था।

ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग प्रत्येक धर में ढेकी होती थी, ढेकी के लिये अलग से कमरा होता था जिसमें सिर्फ धान कूटने का ही काम किया जाता था। अधिकांशत धरों के बरामदे में किनारे ढेकी को स्थापित किया जाता था। 

प्रत्येक घरों में होती थी ढेकी

गुजरे जमाने में ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग प्रत्येक धरों में ढेकी होती थी। ढेकी के लिए अलग से कमरा होता था,जिसमें सिर्फ धान कूटने का ही काम किया जाता था,इसे ढेकी घर कहते थे।

पैर से ढेकी एक सिरे को दबाया जाता था क्रमशः....

वैसे कई घरों के बरामदे में भी ढेकी देखने को मिलते थे,पैर से ढेंकी के एक सिरे को दबाया जाता है तो दुसरे तरफ धान पर ढेकी की चोट पड़ती थी और धान कूटने का कार्य परंपरागत तरीके से हो जाता था,बेटी ब्याहने से पूर्व लड़की के परिजन इसलिये ढेकी देखते थे कि शादी के बाद उनकी बेटी को धान कूटने के लिए दूसरे के घर नहीं जाना पड़ेगा।

ढेकी वाले चावल की गुणवत्ता का जोड़ नहीं

ढेकी से कूटे हुए धान में पौष्टिक तत्व अधिक मात्रा में रहती थी, जो खाने में भी काफी स्वादिष्ट होता था,ढेकी से कूटे चावल की खुशबू भी गजब की रहती थी।