2 से 3 घंटे अस्पताल में वाहन का इंतजार, निजी वाहन भी नहीं मिला; परिजनों की मजबूरी ने दूरस्थ क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था पर खड़े किए सवाल
गजानंद कश्यप छत्तीसगढ़ न्यूज डेस्क, छत्तीसगढ़
गरियाबंद_ मैनपुर क्षेत्र से एक बेहद दर्दनाक और मानवता को झकझोर देने वाली तस्वीर सामने आई है। पांच दिनों से लापता कमार जनजाति के बुजुर्ग सुमेर सिंह का शव बरडुला के जंगल में पेड़ से लटका मिला। परिजनों द्वारा तलाश किए जाने के बाद शव की पहचान की गई। सूचना मिलने पर पुलिस ने मौके पर पहुंचकर पंचनामा कार्रवाई की और पोस्टमार्टम कराया।
पोस्टमार्टम के बाद शुरू हुई परिजनों की असली परेशानी
पोस्टमार्टम की कार्रवाई पूरी होने के बाद परिजनों को शव घर ले जाने के लिए मुक्तांजलि वाहन का इंतजार करना पड़ा। बताया जा रहा है कि परिजन करीब 2 से 3 घंटे तक अस्पताल में वाहन का इंतजार करते रहे, लेकिन तत्काल कोई व्यवस्था नहीं हो सकी। निजी वाहन की तलाश भी की गई, लेकिन वह भी उपलब्ध नहीं हो पाया।
मजबूरी में बल्ली के सहारे शव लेकर निकले परिजन
जब काफी इंतजार के बाद भी शव ले जाने के लिए वाहन नहीं मिला, तो परिजनों के सामने कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा। आखिरकार उन्होंने लकड़ी की बल्ली के सहारे शव को बांधा और पैदल ही अंतिम संस्कार के लिए ले जाने को मजबूर हुए।
इस पूरे घटनाक्रम की तस्वीरें सामने आने के बाद क्षेत्र में स्वास्थ्य और शव परिवहन की व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
बीएमओ ने बताई वाहन उपलब्ध नहीं होने की वजह
इस संबंध में बीएमओ डॉ. गजेंद्र ध्रुव के मुताबिक, जिले का मुक्तांजलि वाहन उस समय कुड़ेदादर गया हुआ था, जिसके कारण तत्काल वाहन उपलब्ध नहीं हो सका।
दूरस्थ क्षेत्र में वैकल्पिक व्यवस्था पर सवाल
मैनपुर जैसे दूरस्थ और आदिवासी क्षेत्र में यदि एकमात्र शव वाहन किसी अन्य स्थान पर गया हुआ हो, तो ऐसी आपात स्थिति के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं थी? यह सवाल अब सामने आ रहा है।
शव को अंतिम संस्कार के लिए इस तरह पैदल ले जाने की स्थिति ने क्षेत्र की स्वास्थ्य सुविधाओं और शव परिवहन व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि दूरस्थ इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ आपातकालीन परिवहन की पर्याप्त व्यवस्था होना बेहद जरूरी है।
मैनपुर क्षेत्र में इससे पहले भी एंबुलेंस और शव परिवहन की व्यवस्था को लेकर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में यह घटना एक बार फिर व्यवस्था की जमीनी स्थिति पर चर्चा का विषय बन गई है।
फिलहाल सवाल यही है कि आपात स्थिति में यदि शव वाहन उपलब्ध नहीं हो, तो दूरस्थ क्षेत्र के जरूरतमंद परिवारों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था कौन सुनिश्चित करेगा?





